Thursday, April 03, 2025
दुश्मन को संभलने का भी मौका नहीं देती हैं हाइपरसोनिक और बैलेस्टिक मिसाइल
दुश्मन को संभलने का भी मौका नहीं देती हैं
हाइपरसोनिक और बैलेस्टिक मिसाइल
नई दिल्ली (आनलाइन डेस्क)। उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन द्वारा कराए गए हाइपरसोनिक मिसाइल टेस्ट को लेकर लगातार जापान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका से प्रतिक्रिया आ रही हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि इस मिसाइल टेस्ट से इन देशों की चिंता बढ़ी है। बीते दशकों में किम जोंग उन समूचे कोरियाई प्रायद्वीप ओर अन्य देशों के लिए बड़ा खतरा बनता दिखाई दिया है।
इसमें कोई शक नहीं है कि यदि उत्तर कोरिया का ये मिसाइल टेस्ट सफल हुआ है तो ये उसकी बड़ी उपलब्धि है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ इसको लेकर दो चीजें सामने आ रही हैं। दरअसल, दक्षिण कोरिया की न्यूज एजेंसी यानहाप ने इस मिसाइल को एक बैलेस्टिक मिसाइल बताया है। वहीं उत्तर कोरिया ने इसको हाइपरसोनिक मिसाइल बताया है। सवाल ये है कि आखिर ये क्या थी। ऐसा इसलिए है क्योंकि दोनों में बड़ा अंतर होता है।
त्तर कोरिया की मिसाइल को लेकर जो जानकारी दी गई हैं उसके तहत इस मिसाइल ने करीब 700 किमी लंबा सफर तय कर टार्गेट को सफलतापूर्वक हिट किया। इसकी गति के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। आपको बता दें कि हाइपरसोनिक और बैलेस्टिक मिसाइल का सबसे बड़ा अंतर इसकी गति और आकाश में इसकी ऊंचाई तक जाना ही होती है। यहां पर ये भी जानलेना बेहद जरूरी है कि दोनों ही मिसाइल धरती के वातावरण से बाहर निकलकर वापस रीएंट्री करती हैं और अपने दुश्मन पर करारा हमला करती हैं।
इन मिसाइल की स्पीड इतनी अधिक होती है कि दुश्मन को संभलने का मौका नहीं मिल पाता है। वहीं अंतरिक्ष में एंटी करने की वजह से ये दुश्मन के राडार पर नहीं आ पाती हैं। यही दोनों कारणों से इस तरह की मिसाइलों की गिनती बेहद घातक मिसाइलों में की जाती है।
हाइपरसोनिक मिसाइल जहां आसमान का सीना चीरते हुए करीब 5-10 मैक ((3800 मीटर प्रति घंटा) ) की गति से ऊपर जाती है वहीं बैलेस्टिक मिसाइल की गति इससे कहीं अधिक करीब 15 मैक (15000 मीटर प्रतिघंटे) की होती है। इस गति का अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकता है कि कोई वायु यान या लडाकू जेट 1-2 मैक की गति पर ही उड़ान भरते हैं। इन दोनो तरह की मिसाइलों में एक बड़ा अंतर ये भी है कि हाइपरसोनिक मिसाइल जहां अंतरिक्ष में कुछ किमी की ऊंचाई तक जाती है वहीं बैलेस्टिक मिसाइल 800 से 1200 मील की ऊंचाई तक जाकर फिर वापस धरती के वातावरण में आती है।
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स्रोत:jagran.com